गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

1992 से अब तक हुए बड़े घोटाले


भ्रष्टाचार का समाधान
-मनीष सिसोदिया
ऊपर दिए गए घोटालों की यह लिस्ट और भी बढ़ाई जा सकती है। और हम सब जानते हैं कि यह बहुत लंबी है। लेकिन यहां मकसद वह सब दोहराना नहीं बल्कि समाधान पर विचार करना है। दरअसल जैसे ही कोई घोटाला सामने आता है तो कुछ जुमले चल निकलते हैं यथा- भारत घोटालों का लोकतन्त्र बन चुका है, भ्रष्टाचार हमारा सामाजिक चरित्र बन चुका है... 'सब के सब चोर हैं'...  'इस देश का कुछ नहीं हो सकता'... 'हर आदमी अपने अपने स्तर पर चोर है'... 'तभी तो चोर नेता चुने जाते हैं'... आदि आदि... और इन सबके बीच असली मुद्दा दबा दिया जाता है कि मर्ज की दवा क्या है। वस्तुत: तो इस शोर में यह सवाल भी दब जाता है कि मर्ज क्या है।
मर्ज और दवा की बात करें तो भ्रष्टाचार की घटना के मूल में जाकर विश्लेषण करना पड़ेगा. भ्रष्टाचार को लेकर हमारे देश में दो कारण चर्चा में बने रहते हैं- 
  • व्यवस्था यानि शासन में खामी है: देश के तमाम नेता, अफसर भ्रष्ट हो गए हैं, और इनके साथ साथ जज, वकील और पत्रकार भी भ्रष्ट हो गए हैं अत: किसी का कुछ नहीं बिगड़ता।
  • व्यक्ति में खामी है: देश का लगभग हर आदमी अपने कार्य व्यवहार में ईमानदारी नहीं बरत रहा जिसे आचरण या चरित्र कहकर समझाया जाता है। 
आज़ादी के बाद जितने भी आन्दोलन चले हैं, सुधार के कार्यक्रम चले हैं वे कुल मिलाकर व्यवस्था सुधार (बदलाव) या व्यक्ति सुधार पर केन्द्रित रहे हैं। अधिकांशत: ये दोनों धाराएं एक दूसरे से अलग अलग भी चली हैं। ``व्यवस्था बदलाव´´ या ``व्यक्ति-सुधार´´ अभियानों से जुड़े लोग प्राय एक दूसरे के प्रयासों का उपहास उड़ाते देखे जा सकते हैं। 
लोकतन्त्र को मजबूत करने के जनान्दोलनों की वजह से कई कानून बने, नीतियों बदलीं यहां तक कि सत्ता में वर्षों से जमें बैठे लोगों को जनता ने उखाड़ कर फेंक दिया। लेकिन इन तमाम परिवर्तनों के बावजूद आज अगर भ्रष्टाचार का ग्राफ कम होने की जगह बढ़ा है तो अपनी ही उपलिब्ध् पर सवाल उठाने की ज़रूरत है। इसी तरह व्यक्ति निर्माण, समाज सुधार, धर्म-संस्कृति के तमाम प्रयासों का आकलन भी इसी कसौटी पर होगा कि आज आदमी के मन में बेईमानी, लालच आदि का ग्राफ बढ़ा है या कम हुआ है? व्यक्ति-व्यक्ति के बीच दीवारें गिरी हैं या बढ़ी हैं?
आज देश और समाज के जो हालात हैं और उन्हें देख कर लगता है कि ये दोनों ही तरह के प्रयास अगर निरर्थक नहीं तो अधूरे तो साबित हुए हैं। 
वस्तुत: व्यवस्था सुधार के कार्यक्रम देश के लोगों को सुविधाएं दिलाने तक ज्यादा केन्दित रहे हैं। किसके लिए क्या योजना बन जाए, हमारी आवाज़ सुनो और फलां समुदाय को योजनाओं की भीख दो.... फलां फलां चोर को सज़ा देने की नीति बनाओ... योनजाएं बनी हैं और उनसे लाखों लोगों को फायदा हुआ है। चोरों को सज़ा देने के लिए कानून बने लेकिन उन कानूनों के रखवाले चोर हो गए। फिर उन रखवालों की रखवाली के लिए कानून बने और फिर वे सुपर रखवाले भी चोरों की जमात में शामिल हो गए... यह है अब तक के तमाम राजनीतिक-लोकतान्त्रिक संघर्षों की समीक्षा जो हमने भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए और जीते भी। लेकिन किसी भी गांव में चले जाईए, कस्बे-शहरों में लोगों से बात करके देख लीजिए, अधिकतर लोग किसी (राजनीतिक) मसीहा का इन्तज़ार कर रहे हैं कि कोई आए और हमारे यहां के भ्रष्टाचार को खत्म कर दे, हमारी गरीबी दूर कर दे... आदि आदि...
लोकतान्त्रिक संघर्षों के क्रम में सूचना के अधिकार कानून के पांच साल के अनुभव के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि जनता के लिए भीख मांगने से काम नहीं चलेगा। जो कानून इन अधिकारियों और नेताओं को फैसले लेने या राज करने का अधिकार देते हैं उन कानूनों का शिकंजा खत्म कर सत्ता सीधे जनता के पास वापस दे दी जाए। जनता पांच साल में वोट देकर नहीं बल्कि सीधे, रोज़मर्रा के जीवन में इन अधिकारियों और नेताओं को नियन्त्रित करे। गांवों में ग्राम सभाएं और शहरों में मोहल्ला सभाएं (यहां चुनिन्दा लोगों की समितियों की बात नहीं हो रही, इलाके के तमाम नागरिकों को मिलाकर सभा कहा जाता है) अपने अपने इलाके की पंचायतों या नगर निगमों को नियन्त्रित करें। इन पंचायतों या निगमों से सम्मिलित रूप से ज़िला स्तर की व्यवस्थाएं, प्रशासन और पुलिस सहित, नियन्त्रित हों। ज़िला स्तर की पंचायतें राज्य व्यवस्था को नियन्त्रित करें और फिर राज्य व्यवस्था केन्द्र व्यवस्था को। (यही स्वराज अभियान है जिसके बारे में हम समय समय पर अपना पन्ना में सामिग्री प्रकाशित करते रहते है)। अब तो बस ऐसी व्यवस्था का लक्ष्य रखकर काम किए जाने की आवश्यकता है। 
लेकिन जब बाढ़ का पानी घरों में घुसा हो तो मुहाने बन्द करने के अभियानों से ही काम नहीं चलता। मुहाने तो बन्द करने ही पड़ेंगे घर की मरम्मत भी करनी पड़े़गी। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ एक्शन लेने के नाम पर जो दिखावा हो रहा है उसकी पोल खोलते हुए एक ऐसा कानून लाने की भी आवश्यकता है जो इन भ्रष्ट लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठा सके। यहां हम लोकपाल बनाने की बात कर रहे हैं। लोकपाल संस्था के पास जहां भ्रष्ट लोगों के खिलाफ एक्शन लेने के स्पष्ट अधिकार हों वहीं इस संस्था में काम करने वाले लोगों की नियुति एकदम पारदर्शी और जनभागीदारी तरीके से हो। तभी ये लोग भ्रष्टों के खिलाफ एक्शन ले पाएंगे। 
परन्तु भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून बनाने या शासन के तरीके बदलने से भर से काम नहीं चलने वाला है। भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जो कमोबेश हर क्षेत्र में है और देश के हर नागरिक को प्रभावित कर रही है। और इसका निदान हम सिर्फ शासन-प्रशासन या कुछ कानूनों में लिखे शब्दों के सहारे फैसला लेने वाली संस्थाएं, जिन्हें हम न्यायालय कहते हैं, के स्तर पर नहीं निकल सकता। कोई भी कानून आदमी की कल्पनाशीलता से बड़ा नहीं हो सकता। आप चाहे जो कानून बना लीजिए, अगर देश के हर नागरिक के मन में व्यवस्था के प्रति सम्मान नहीं है तो कानून टूटेगा ही। कोई दबंगई से तोड़ेगा तो कोई हेरा फेरी से। अत: भ्रष्टाचार के समाधान पर काम करते वक्त एक और पहलू पर काम करने की ज़रूरत है। यह पहलू है शिक्षा का पहलू। 
देश को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो खुद भी भ्रष्ट न हों, हर काल, परिस्थिति में अपने समाज व देश के प्रति निष्ठावान रहें तथा भ्रष्टाचार को जो वातावरण चारों तरफ बन गया है उसे ठीक करने में सहभागी हों। सूचना के अधिकार कानून के तहत शिक्षा विभाग से पूछा गया था कि एक ऐसे समय में जब पूरा देश भ्रष्टाचार की समस्या से झूझ रहा है, आने वाली पीिढयों को भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील बनाने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए क्या क्या पाठ पाठयक्रम में शामिल किए गए हैं। शिक्षा विभाग ने बड़ी बेशर्मी से कह दिया कि ऐसे कोई पाठ हमारे यहां नहीं है। 
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हर पढ़ा लिखा आदमी अपनी ज़िन्दगी का 20 साल शिक्षा व्यवस्था को सौपता है। वह भी इस स्वीकृति के साथ कि जो भी ज़रूरी है सिखाईए। इसके बाद भी अगर हम अपनी एक बड़ी आबादी के मन में यह बात नहीं बिठा पा रहे कि भ्रष्टाचार गलत है, तो क्या इसके लिए शिक्षा व्यवस्था दोषी नहीं है। इस्के उलट लगभग हर पढ़ा लिखा आदमी अगर भ्रष्टाचार को सहते हुए, उसमें शामिल होते हुए या उसे बढ़ावा देते हुए दिखता है तो क्या इस पर गौर करने की ज़रूरत नहीं है कि उसे कुछ गलत पढ़ाया जा रहा है। बीस साल की शिक्षा में जिस आदमी को एक ही मन्त्र समझ में आया हो कि अब अगर कुछ बनना है तो पहले पैसा कमा लो, ऐसे आदमी को भ्रष्ट होने से कौन सा कानून रोक सकता है। 
इस नज़रिए से देखना होगा कि इस भ्रष्टाचार की जड़ शिक्षा में है और इसे बदले बिना कोई कानून-व्यवस्था सफल नहीं हो सकती। शिक्षा के सन्दर्भ में पहले भी बहुत सवाल उठाए गए हैं। कई आन्दोलन अभियान चले हैं लेकिन मोटे तौर पर देखें तो एक सिद्धांत तो सारे भ्रष्टाचार की जड़ है वह है अर्थशास्त्र की वह शिक्षा जिसके तहत आदमी को सिखाया जा रहा है कि आवश्यकताएं असीम हैं साधन सीमित हैं। लगभग हर पढ़े लिखे आदमी को अपनी आवश्यकताएं असीम नज़र आती हैं और इन असीम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए असीम धन कमाने की आवश्यकता कमाना पड़ेगा, यह सीख लेकर लेकर हर पढ़ा लिखा आदमी समाज में प्रवेश कर रहा है। इन आवश्यकताओं को लालच आदि बताते हुए अध्यात्म आदि की शिक्षा में आवश्यकताओं को नितन्त्रित या कम करने की बात भी सिखाने की कोशिश की गई लेकिन इसका समाज पर तो कोई असर नहीं दिखता। यहां तक कि अध्यात्म की दुकान चलाने वाले दुकानदार सबसे अधिक पैसे के पीछे भागते देख जा सकते हैं। 
तब समाधन क्या है? बीस साल की शिक्षा का विकल्प एक लेख में बताना सम्भव नहीं है लेकिन संकेत किया जा सकता है। आदमी की मूलत: दो तरह की आवश्यकताएं हैं. एक तरफ हैं- रोटी, कपड़ा, मकान, गाड़ी, मोबाईल... और भी तमाम तरह की सुविधाएं...। इनका कितना भी फैलाव हो, इनकी एक सीमा रहेगी, ये असीम आवश्यकताएं नहीं है। हर हालत में इनकी एक सीमा है। लेकिन दूसरी तरफ है सम्मान और पहचान। जो असीमीत है वस्तुत: निरन्तर आवश्यकता है। लेकिन इन्हें सामान से नहीं लिया जा सकता। सामान में ढूंढा गया सम्मान और पहचान न तो असीम हो सकता है और न ही निरन्तर. अत: इसके लिए असीम सामान चाहिए और फिर असीम धन। जो बिना भ्रष्टाचार के आएगा नहीं। इसके लिए शोषण करना पड़ेगा। शोषण होगा तो विरोध् और युद्ध भी होगा। 
धरती के तमाम विश्वविद्यालय और स्कूल कालेज अगर आदमी को सिर्फ यह ध्यान दिलाने में कामयाब हो जाएं उसकी आवशकता क्या हैं और वो कहां से पूरी होंगी. उन्हें तो कम करने की ज़रूरत है और न वे असीम हैं. अगर बीस साल की शिक्षा में यह काम हो जाए तो फिर न तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून की ज़रूरत पड़ेगी और न अभियान की. 
समाधान तो जब भी निकलेगा यहीं से निकलेगा. लेकिन बात फिर वही है कि जब बाढ़ आई हो तो सिर्फ मुहाने बन्द करने से काम नहीं चलेगा. बाढ़ राहत के कार्यक्रम भी चलाने होंगे. 

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